Ek Saadharan Prem Kahani Jo Dheere-Dheere Khamoshi Mein Kho Gayi

एक प्यार जो सामान्य सा शुरू हुआ और खामोशी में खत्म हो गया

वे दोनों उसी तरह मिले जैसे अधिकतर साधारण प्रेम कहानियां शुरू होती हैं, किसी तय योजना के बिना, किसी बड़े संयोग के बिना, बस एक सामान्य सी मुलाकात से.

आरव हर शाम अपने ऑफिस के पास वाले छोटे से कैफे में बैठा करता था. वह कोने वाली मेज चुनता था, कॉफी धीरे-धीरे पीता और अपने विचारों में खोया रहता. बाहर की दुनिया तेज चलती थी, लेकिन उस कैफे के अंदर सब कुछ धीमा लगता था, मानो समय भी थोड़ी देर के लिए रुक गया हो.

एक बारिश वाली शाम, जब आसमान भारी बादलों से ढका हुआ था, उसने उसे पहली बार देखा.

वह काउंटर के पास खड़ी थी, हाथ में छतरी पकड़े, बाल हल्के गीले, और आंखें मेन्यू बोर्ड पर टिकी हुई थीं. उसके चेहरे पर कोई उलझन नहीं थी, बस एक शांत ध्यान था, जैसे वह हर छोटी बात सोच-समझकर करती हो.

जब उसने मुड़कर देखा, उनकी नजरें बस एक पल के लिए मिलीं. कोई नाटकीय क्षण नहीं था, कोई दिल धड़कने वाला दृश्य नहीं था, बस एक साधारण सा नजरों का टकराव, जो शायद थोड़ा सा ज्यादा देर तक ठहरा.

उस दिन वे बात नहीं किए.

अगले दिन भी वह आई.

इस बार वह आरव के सामने वाली मेज पर बैठ गई. आरव ने देखा कि वह अपनी चाय को कितनी शांति से हिला रही थी, मानो हर हलचल का अपना अलग महत्व हो.

तीसरे दिन, आरव ने हिम्मत जुटाई और उससे बात की.

उसने कोई बड़ी बात नहीं कही, बस पूछा कि क्या उसके बगल की कुर्सी खाली है. उसने हल्की सी मुस्कान दी और कहा, हां, बैठ सकते हैं.

उस छोटी सी बातचीत से कुछ बड़ा शुरू हो गया, हालांकि उस समय किसी को इसका एहसास नहीं था.

उसका नाम मीरा था.

वह एक ग्राफिक डिजाइनर थी, पूरे दिन स्क्रीन के सामने बैठकर रंगों, आकारों और भावनाओं को तस्वीरों में ढालती थी. वह ज्यादा नहीं बोलती थी, लेकिन जब बोलती, तो हर शब्द सोच-समझकर चुनती.

आरव ने उसे अपने काम के बारे में बताया, लंबी मीटिंग्स, अंतहीन एक्सेल शीट्स, और एक ऐसी जिंदगी जो दिखने में व्यवस्थित थी, लेकिन भीतर से खाली लगती थी. मीरा ध्यान से सुनती रही, बीच-बीच में हल्के सवाल पूछती, जिससे आरव को लगा कि कोई सच में उसे समझने की कोशिश कर रहा है.

धीरे-धीरे, रोज शाम कैफे में मिलना उनकी आदत बन गई.

वे अपने बचपन की बातें करते, अपने सपने साझा करते, अपनी छोटी-छोटी निराशाओं पर हंसते और कभी-कभी चुपचाप बैठकर बस एक-दूसरे की मौजूदगी महसूस करते.

आरव को उन मुलाकातों का इंतजार रहने लगा. सिर्फ मीरा के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि उसके साथ रहकर वह खुद को हल्का महसूस करता था, जैसे कोई बोझ उतर गया हो.

मीरा भी इस जुड़ाव में सुकून महसूस करती थी.

वह पहले भी प्यार कर चुकी थी, लेकिन वह रिश्ता उसे उलझन और दर्द देकर खत्म हुआ था. इसलिए वह फिर से किसी के करीब आने से डरती थी. मगर आरव के साथ उसे ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ. कोई दबाव नहीं, कोई जल्दबाजी नहीं, बस एक शांत अपनापन.

एक शाम, जब वे सड़क पर धीमे-धीमे चल रहे थे, आरव अचानक रुका और पूछा कि क्या वह कभी उसके साथ डिनर पर चलना चाहेगी.

मीरा कुछ पल रुकी, जैसे वह उस क्षण को महसूस करना चाहती हो, फिर धीरे से मुस्कुराकर हां कह दिया.

उनका रिश्ता बहुत स्वाभाविक तरीके से बढ़ा.

वे सप्ताहांत पर मिलते, छोटी-छोटी किताबों की दुकानों में जाते, शांत सड़कों पर चलते, और घंटों बातें करते. वे वह जोड़ी नहीं थे जो सबका ध्यान खींचे, लेकिन उनका रिश्ता गहरा था, भरोसे और समझ पर टिका हुआ.

कोई एक पल ऐसा नहीं था जब वे अचानक प्यार में पड़े. यह धीरे-धीरे हुआ, बिना शोर के, बिना किसी बड़े इज़हार के.

कुछ समय तक सब कुछ सही लगा.

लेकिन प्यार जितना सुंदर होता है, उतना ही वास्तविक दुनिया के दबावों से प्रभावित भी होता है.

आरव पर काम का बोझ बढ़ने लगा. उसके परिवार को उम्मीद थी कि वह जल्द ही शादी करेगा, लेकिन एक पारंपरिक तरीके से, किसी ऐसे व्यक्ति से जिसे वे चुनेंगे. वह देर तक ऑफिस में रुकने लगा, थका हुआ घर लौटता, और पहले जितनी बार मीरा को फोन नहीं कर पाता था.

मीरा ने यह बदलाव महसूस किया.

उनकी बातचीत छोटी होती गई, पहले जैसी गहराई नहीं रही. जहां पहले हंसी थी, अब झिझक थी. जहां पहले गर्माहट थी, अब दूरी थी.

किसी ने लड़ाई नहीं की, इसलिए किसी ने कुछ कहा भी नहीं.

एक शाम, मीरा ने धीरे से पूछा कि क्या सब ठीक है. आरव ने मुस्कुराकर कहा कि हां, लेकिन उसकी आवाज में एक अनकही उलझन थी.

दिन बीतते गए.

वे मिलते रहे, लेकिन कुछ बदल चुका था, जैसे कोई धागा धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा हो, टूटे बिना.

एक बारिश वाली रात, ठीक उसी तरह जैसे वे पहली बार मिले थे, वे चुपचाप साथ चल रहे थे. बारिश हल्की-हल्की गिर रही थी, सड़क की बत्तियां पानी में सुनहरी चमक बिखेर रही थीं.

आखिरकार मीरा बोली.

उसने कोई आरोप नहीं लगाया, कोई शिकायत नहीं की. बस इतना पूछा कि क्या वह अब भी पहले जैसा महसूस करता है.

आरव रुक गया.

उसने मीरा की आंखों में देखा और महसूस किया कि वह उससे बहुत जुड़ा हुआ है, लेकिन साथ ही उसे अपने भविष्य को लेकर असमंजस भी है. वह नहीं जानता था कि प्यार और जिम्मेदारी के बीच कैसे संतुलन बनाए.

वह तुरंत जवाब नहीं दे पाया.

वह चुप्पी सब कुछ कह गई.

मीरा ने धीरे से सिर हिलाया, हार मानकर नहीं, बल्कि समझकर. उसने उससे रुकने की विनती नहीं की, न ही उसे दोष दिया.

वे फिर चल पड़े, लेकिन कुछ पहले ही खत्म हो चुका था, बिना बोले.

उस रात उनका विदा लेना भी पहले जैसा नहीं था. कोई नाटकीयता नहीं, बस भारी मन और अनकहे शब्द.

अगले दिनों में उन्होंने आधिकारिक रूप से ब्रेकअप नहीं किया.

उन्होंने बस बात करना बंद कर दिया.

संदेश कम होते गए, फिर बिल्कुल बंद हो गए. फोन कॉल्स की जगह खामोशी ने ले ली. मुलाकातें यादों में बदल गईं.

कोई लड़ाई नहीं हुई. कोई धोखा नहीं था.

उनका प्यार टूटा नहीं.

वह बस फीका पड़ गया.

कई महीने बाद, आरव उसी कैफे के सामने से गुजरा. वह रुका, अंदर झांका, और कोने वाली मेज की तरफ देखा, जैसे उसे उम्मीद हो कि मीरा वहां बैठी होगी, अपनी चाय धीरे-धीरे हिलाते हुए.

मेज खाली थी.

मीरा भी कभी-कभी उसी सड़क से गुजरती थी जहां वे साथ चलते थे. उसके दिल में हल्की सी टीस उठती, लेकिन गुस्सा नहीं, बस याद.

उन्होंने कभी दोबारा बात नहीं की.

फिर भी, दोनों अपने दिलों में एक-दूसरे का थोड़ा सा हिस्सा लिए चलते रहे, जैसे एक प्यार जो साधारण तरीके से शुरू हुआ और बिना शोर के खत्म हो गया.

कुछ प्रेम कहानियां जोर से नहीं टूटतीं.

वे बस धीरे-धीरे खामोशी में खो जाती हैं.

और शायद यही सबसे दर्दनाक अंत होता है.

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